होली है होला है ,नीचे की सड़क पर ।
विकट वेष तरुणों के होठों पर
चुनी हुई गालियाँ हैं
चरस और सिगरेट से उठता हुआ
धुएँ का गोला है ...होला है ....
होली छाछठ्वीं वर्षगाँठ स्वतंत्रता की।
नेता लोग कहतें हैं चमक रहा भारत है
फील गुड फैक्टर को फील ग्रेट करना ही
उनकी महारथ है।
इतनें अल्प काल में गगन धरा पर
कहीं लाया जा सकता है ?
यह तो सर्व विदित है ,चढ़कर दिब्य -रथ पर ही।
स्वप्न -स्वर्ग पाया जा सकता है।
जर्मनी ,जापान ,इजरायल छोटे हैं
भारत महान है
उसकी परम्परा में आज भी जान है।
आज भी लाल लटकाये जीभ
काली माँ खप्पर में धर्म -भीख लाती है
आज भी मन्दिर के कोने में देवदासी
भक्तों की थपकन पा जीवित मर जाती है
हर आध घंटें में एक सती जलती है
हर धर्म -पीठ में गर्भ -गृह होता है
सुबक सुबक कर थक राम के सहारे ही
भूखा शिशु लक्ष लक्ष गृहों में सोता है
जो कुछ है उसे सहो -अपनी परम्परा है
राम जब चाहेंगे दाया हो जायेगी
भाग्य के धनी है जो आज भी सुखी हैं वे
चाहेंगे गिरधर जब छाया हो जायेगी।
खिलने दो दीवाली को क्षीर नाथ की
छटा होली का शिखर पुरुष अलमस्त
भोला है-होला है ..........
दस सहस्त्र वर्षों में सुबक सुबक रोया है
चून का घोल पी श्रम -शिशु सोया है
दस सहस्त्र वर्षों से भूखा प्रहलाद
लाल लपटें पी जाता है
दस सहस्त्र वर्षों में श्रम -शिशु
सर्व भक्षी होली में जलकर जी जाता है।
सामने छत पर
बन्दर बन्दरिया के जोड़े को
मिलने दो
बन -नर आधुनिक विमान कहता है
होली के दूल्हे का सच्चा
सह्भोला है।
होला है ॥
होले की हूल