ईस्वरीय वरदान

आयीं तुम कन्ये
तीन बन्धुओं के बाद
मेरे घर मेरे द्वार |
चाहिये था मुक्त हृदय स्वागत तुम्हारा
ईश्वरीय वरदान
स्वर्ण किरण
कल्प -तरु कोपल सी
किन्तु जड़ आत्मघाती ब्राम्हण परम्परा
आयीं अभिशप्त तुम
हंस न सके बूढ़े ओंठ दादी के
स्वजन सम्बन्धी सभी मान चले
अवतरण तेरा मम बालिके
काजल रेख
जननी भी तुम्हारी
संस्कारों के बोझ तले
चाहती हो बनना
सम्भवतः नर जननी ही
नारी से नारी ही
उपेक्षित समाज में |
पहले ही दिन से
 पहले सम्पर्क से
जाना था तुमनें
उपेक्षा का संवेदन
किन्तु तुम चाँद सी पनप चलीं
प्रतिफल प्रतिक्षण
थिरक उठीं विधु लेखा |
जानें क्यों मेरे सामीप्य में
(भ्रम ही था मेरा क्या )
हँसती तुम
पाटल कली सी
स्फुटन प्रयास में |
तुलसी -क्षवि सूर -वात्सल्य
सभी गम्य हुये
मेरी जड़ चेतना जान सकी
अर्थ क्या ममता का
आत्म सम्मोहन का |
और जब
सांझ के झुरमुट में
उगते सितारों की छाँह में
कलित -किलकारियां ले
खेलती तुम गोद में
मन मेरा सतरंगी
वादियों में उड़ता
कुछ क्षण को भूल जाता
त्रसित नियति को |
मन के अन्धकार में
चमक उठीं पुत्री तुम
बनकर आकाश -दीप
साथी रहे थे सदा
मेरे इस जीवन में
ताप ,शाप ,परिताप
शायद कुंभकार ने
खीज भरी रिक्तता के किसी लम्बे क्षण में
मुझको गढ़ डाला था
और क्या इसीलिये
अपनें क्षीण बल के साथ
मैनें ललकारा था
श्रष्टा का अस्तित्व |
किन्तु तुम आयीं तो सन्देह ढल चला
खण्ड -खण्ड बिखर गये
ऊँचे अनास्था दुर्ग
मन की परत तोड़
रस -धार निकल बही
विपुल कला विपुल रूप
खिली स्वर्ग -छवि प्रभूत
झुलसित जो राग -मूल
तुम्हें देख सरसे
रेत के प्रसार में
विजन विस्तार में
भाव के पयोधर फिर
बूँद -बूँद बरसे |
हाय ! फिर निष्ठुर नियति
का प्रकोप हुआ
मेरा दुर्भाग्य राहु
मुंह खोल -दौड़ा
ज्वर बन दबोच लिया
चन्द्र ज्योति मलिन हुयी
आत्मा के दर्पण
उन नील कमल नेत्रों में
झलका तटस्थ भाव
कोई कुछ न जान सका
व्याधि क्या निदान क्या
घड़ियाँ कुछ बीतीं
चिर निद्रा में लीन हुयी
मेरी वग्र -छाती पर |
सांस का पिंजर पर
मेरा चलता ही रहा |
बीते दिन बीती रात
आये कितनें प्रभात
जीवन -कर्म चलता है
किन्तु हर सांस में
टूटे विश्वास में
कोई दर्द पलता है |
आज  मैं मानता हूँ
प्रकृति हत्यारी है
नियम -हीन ,न्याय हीन
दुर्दान्त रक्त लिप्त
घोर व्यभिचारीहै |
और कई बार
 मैनें अपनें से पूछा है
सब कुछ अस्वीकार कर
जीवन क्या संम्भव है ?
कहीं कोई धीरे से
मुझसे यों बोला है
दर्द के सहारे ही
जीवन सदा चलता है
अन्यथा स्वयं को स्वयं
मानव ही छलता है |
कन्ये ! तुम्हारी याद सांस बन चलती है |
अपनी अकिंचनता ले
लुंज पुंज जीवन की
सारी निरर्थकता ले
खामोश रातों में
रोती बरसातों में
तुमको पुकारा है
शब्द -हीन -मूक मर्म भेदी
याद कौंधी है |
खग -शिशु
हो कंठ प्राण
माँ को जब बुलायेगा
गो -वत्स सांयकाल
द्वार पर जब राभेंगा
गीता की गरिमा
तब सहज छूट जायेगी
कन्ये , तुम्हारी
किलकारी याद आयेगी
एक किलकारी को
स्मृति के द्वार पर
जीवन का अर्जन
विसर्जन बन जानें दो
पुत्री मुझे ज्ञानी नहीं
जनक बन जाने दो |